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बिश्नोई समाज का अठारहवां नियम (भजन विष्णु) भावार्थ सहित || Explaintion of The Eighteenth rule of Bishnoi society

बिश्नोई समाज का अठारहवां नियम (भजन विष्णु) भावार्थ सहित || Explaintion of The Eighteenth rule of Bishnoi society


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सर्वज्ञ सर्वैश्वर परमपिता परमात्मा श्री विष्णु का ही भजन करना चाहिए। भज= सेवायाम् धातु से भजन शब्द बनता है। इसलिए भजन करने का अर्थ है कि विष्णु परमात्मा की ही सेवा करनी चाहिए, अन्य किसी देवी-देवताओं की सेवा पूजा नहीं करनी चाहिए। हम लोग परमात्मा की क्या सेवा कर सकते हैं, हमारे पास हमारा अपना निजी धन भी क्या है जो उनको दे सकें। और तो हमारे पास देने को कुछ नहीं है केवल एक अहंकार ही हमारे पास है वही हम दे भी सकते हैं। हम अहंकार को समर्पण करके आनंद विसर्जन नहीं हो जाता है तब तक न तो हम सेवा ही कर सकते, न ही नाम, जप, यज्ञ, संध्यादिक ही कर सकते, यदि कुछ किया भी जाता है तो वह केवल दिखावा ही होगा वास्तविकता से बहुत दूर होगा। अनेकानेक संतों ने नाम जप के संबंध में अपनी भिन्न-भिन्न राय प्रकट की है। किसी ने राम-नाम का जप बतलाया है तो किसी ने कृष्ण या शिव या अन्य कुछ और ही बतलाया है किन्तु जम्भेश्वरजी ने इन्हीं परम्परागत लीक से हटकर
विष्णु-विष्णु यही जप बतलाया है क्योंकि सभी लोग एकमत से स्वीकार करते हैं किसगुण साकार चाहे राम हो कृष्ण हो या शिव हो येसभी अवतार विष्णु के ही हैं। इन्हीं सभी का आदि मूल पुरुष विष्णु परमात्मा ही है इसीलिए एक विष्णु का जप स्मरण होने से सभी अवतारों का स्मरण हो जाता है मूल में पानी सिंचने से डालियां पत्ते आदि तो सभी हरे- भरे हो जाते हैं। किन्तु डालियां पत्ते आदि सींचोगे तो मूल हरा-भरा नहीं हो सकेगा। सभी अवतारों का समन्वय एक विष्णु में
ही हो सकता है इसीलिए विष्णु जप का ही आदेश दिया है जिससे एक का जप करने से सभी के जप का फल मिल जाता है।

साभार: जम्भसागर
लेखक: आचार्य कृष्णानन्द जी
प्रकाशक: जाम्भाणी साहित्य अकादमी 




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