Subscribe Us

header ads

बिश्नोई समाज का बारहवां नियम (क्षमा और दया) भावार्थ सहित || Explaintion of The Twelfth rule of Bishnoi society

बिश्नोई समाज का बारहवां नियम (क्षमा और दया) भावार्थ सहित || Explaintion of The Twelfth  rule of Bishnoi society


सदा ही क्षमा भाव तथा प्राणियों पर दया हृदय में भाव ये दोनों ही परस्पर एक-दूसरे के आश्रित

हैं। यदि आपके अंदर क्षमा भाव होगा तो किसी पर दया कर सकते हैं और यदि आपके अंदर दया भाव हो तो आप क्षमा भी कर सकते हैं। एक भाव के उदय होने से दूसरा उसके पीछे अपने-आप चला आयेगा, इसलिए दोनों को एक ही नियम के अंदर रखा गया है। यदि किसी ने आपके प्रति कोई अपराध भी कर दिया है तो उस पर दया करके क्षमा कर दें। यह क्षमा तो आप अपने से कमजोर पर ही कर सकते हैं। आप अपने बल से उसको दबा सकते थे किन्तु दयावश उसके अपराध को क्षमा कर दिया। ऐसा करने से वह अपनी गलती समय पाकर अवश्य ही सुधार लेगा। यदि आपसे कोई ताकतवर अधिक है उसका आप कुछ नहीं बिगाड़ सकते तो निराश लो सकते हैं उसे क्षमा नहीं कहा जा सकता। क्षमा तो उसे ही कहना चाहिए जिसमें आप समर्थ होकर भी दयावश क्षमा कर सकता।क्षमा तो उसे ही कहना चाहिए जिसमें आप समर्थ होकर भी दयावश क्षमा कर देते हैं। यह क्षमाशीलता अनेक प्रकार के झगड़ों उपद्रवों के शमन का कारण होती है। क्षमाशीलता से ही सुख शांति रह सकती हैं। इसी प्रकार दया भाव यदि आपके अंदर है तो आप दुःखी प्राणियों की सेवा कर सकते हैं। असहाय दुःखी प्राणी की सेवा दयाभाव से ही हो सकती है। इसलिए कहा है- "दया धर्म को मूल है, पाप मूल अभिमान। तुलसी दया न छोड़िये, जब लग घट में प्राण।" 'अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचन द्वयम्, परोपकाराय पुष्याय पापाय पर पीडनम्।' अठारह पुराणों में व्यास जी के दो ही वचन प्रमुख हैं कि परोपकार करना ही पुण्य है तथा निर्दयता से दूसरे को पीड़ा देना ही पाप है। इसलिए दया से धर्म की उत्पत्ति होती है और निर्दयता से पाप की वृद्धि होती है।



साभार: जम्भसागर
लेखक: आचार्य कृष्णानन्द जी
प्रकाशक: जाम्भाणी साहित्य अकादमी 



टिप्पणी पोस्ट करें

0 टिप्पणियां