बिश्नोई समाज का अठाईसवां नियम (मद्य मांस) भावार्थ सहित || Explaintion of Twenty eighteenth rule of Bishnoi society.

बिश्नोई समाज का अठाईसवां नियम (मद्य मांस) भावार्थ सहित || Explaintion of Twenty   eighteenth rule of Bishnoi society. 


मनुष्य को कभी शराब नहीं पीना चाहिए। यदि जिसने भी शराब का सेवन कर लिया तो समझौ फिर उसने मांस भी खा लिया इसलिए मद्य मांस दोनों को एक ही नियम के अंतर्गत रखे गए हैं। इन दोनों में से एक कर्म कर लिया तो फिर दूसरा भी करने में कोई संकोच नहीं होगा। शराब पीने में अनेक अवगुण शास्त्रकारों ने तथा महापुरुषों ने बताए है- चित्ते भ्रान्तिजयिते मद्यपानाद् भ्रांते चित्ते पाप चय्-र्यमुपैति । पापं कृत्वा दुर्गतिं यान्ति,मिढास्तस्मान्मद्यं नैवपेयं नैव पेयम्।।रत्नाकर।। मद्यपान करने से चित्त में भ्रांति उत्पन्न हो जाती है तथा भ्रांत चित्त से पाप कर्म
ही हो सकते हैं और पापों को करके तो दुर्गति को प्राप्त होता है इसलिए हे मूढ़ ! मद्यपान न करो, न करो। यही सलाह जम्भेश्वर भगवान ने दी थी। क्योंकि सभी अनर्थों का मूल यह शराब ही है। इस अनर्थ के पीछे सभी पाप, अनर्थ चले आते हैं। ऐसा हम लोग व्यवहार में देखते भी हैं। तथा च मद्यपान के और भी अवगुण है। द्यूतं च मांसं च सुरा च वैश्या, पापादि चौर्य परदार सेवा। एतानि सप्त व्यसनानि लोके, पापाधिके पुन्सि सदा भवन्ति ।। सुरापान करने से अन्य व्यसन जैसे जुआ खेलना, मांस खाना, वैश्या गमन करना, चोरी करना, परस्त्री की सेवा करना तथा पापों की अधिकता हो जाना इत्यादि होते हैं। जो मानव को पतित कर देते है। इसलिए मानवता की रक्षा के लिए व्यसनों के मूलरूप शराब को ही काट डालना चाहिए। यदि इस मूल को पानी सिंचते रहे तो फिर कभी भी मानव व्यसनों से छुट्टी पा सकेगा। अपना तथा अपने संबंधियों का जीवन बरबाद कर डालेगा। शराब पीने के पश्चात मनुष्य सुध-बुद्ध खो बैठता है। उसे किसी प्रकार की मर्यादा का भानही नहीं रहता है ऐसे समय में वह कुछ भी कुकर्मकर सकता है। ऐसी कामना करने से ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। अब तक जो भी भयंकर अनर्थ हुए हैंवे सभी इसी मद्यपान के बदौलत ही हुए हैं, सभी झगड़े झंझटों का मूल यह गंदा पानी ही है। इसीलिए ऐसा विचार करके इसका त्याग करें तथा करवायें इस जीवन को स्वर्गमय बनाए तथा बनवायें इससे बढ़कर और कोई जीवन का लाभ नहीं होगा। मांस नहीं खाना इसकी व्याख्या तो जीव दया पालणी के अंतर्गत ही हो गई है पुनः व्याख्या की कोई आवश्यकता नहीं

साभार: जम्भसागर
लेखक: आचार्य कृष्णानन्द जी
प्रकाशक: जाम्भाणी साहित्य अकादमी 



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