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बिश्नोई समाज का चौबिसवां नियम (बैल बधिया) भावार्थ सहित || Explaintion of Twenty fourth rule of Bishnoi society

बिश्नोई समाज का चौबिसवां नियम (बैल बधिया) भावार्थ सहित || Explaintion of Twenty fourth rule of Bishnoi society

बैल को बधिया न तो स्वयं करे और नही दूसरों को प्रेरणा देकर करवायें। जब बछड़ा हल चलाने लायक बड़ा हो जाता है तो लोग उसे कर देते हैं या करवा लेते हैं फिर उसे हल गाड़ी में चलाने के काम में लिया जाता है। यदि ऐसा न करें तो गाड़ी हल चलता नहीं है, काफी परेशान करता है। जब उसे नपुसंक  बनाया जाता है तो वह दृश्य अति करुणामय तथा कष्टदायक होता है। जो पीड़ा उस बछड़े को सहन करनी होती है उसकाकोई आर-पार नहीं हैं। उस समय की छटपटाहट दर्द और चिल्लाना देखने वाले कठोर हृदय मानव को भीपिघला देता है। इसलिए गुरु जम्भेश्वर भगवान ने बिश्नोईयों के लिए यह विशेष धर्म नियम बनाया कि बैल कॅ तपुंसक तुम लोग कभी नहीं करवाना, उस पाप का भागी कभी मत बनना। और न ही अपनी घर की गऊ के बछड़े को हल-गाड़ी ही चलाना औरन ही बधिया करवाना। जो तपुंसक हो चुके हैं, किसी द्वारा कर दिये गये हैं उन्हें खरीदकर अपना कार्य कर लेना। यह नियम भी विशेष रूप से किसानों पर ही लागू होता है क्योंकि व्यापारी या अन्य कार्यकर्ता के लिए ऐसी नौबत ही नहीं आती । यदि आती है तो फिर इस नियम का पालन अवश्यमेव करना चाहिए। यह नियम भी दया की वृद्धि करके जीव की पीड़ा को हरण करने वाला है। इस नियम का पालन भी बिश्नोईयों द्वारा दृढ़ता से होता आ रहा हैं।



साभार: जम्भसागर
लेखक: आचार्य कृष्णानन्द जी
प्रकाशक: जाम्भाणी साहित्य अकादमी 


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