बिश्नोई समाज का उन्नतीसवां नियम (निला वस्त्र धारण न करें) भावार्थ सहित || Explaintion of Twenty ninth rule of Bishnoi society.

बिश्नोई समाज का उन्नतीसवां नियम (निला वस्त्र धारण न करें) भावार्थ सहित || Explaintion of Twenty   ninth rule of Bishnoi society. 



इस नियम द्वारा स्पष्टतया नीला वस्त्र धारण करना बिश्नोई के लिए सर्वथा निषेध किया है क्योंकि स्वभाव से जो सफेद वस्त्र हैं उसको नीले रंग से रंगा जाता है वह रंग ही मूलतः अशुद्ध होता है। इसकी उत्पत्ति तथा रंगाई दोनों ही अपवित्रता से होती है ऐसीशास्त्रों में मान्यता है। इसलिए स्मृति ग्रंथों में नीले वस्त्र धारण निषेध किया है- यथा स्नानं दानं जपो होम:, स्वाध्याय पितृ तर्पणम्। पंचयज्ञा वृथा तस्य नीली वस्त्रस्य धारणात् । नीले वस्त्रों को पहनकरयदि कोई नित्य- प्रति स्नान करे, सुपात्र को दान दें, सायं प्रातःकाल हवन करें या स्वाध्याय अतिथि सेवा आदि शुभ कर्म करें तो भी उन शुभ कर्मों का फल नष्ट हो जाता है तथा अन्य भी बहुत से प्रमाण श्रुति शास्त्रों में नीले वस्त्र निषेध संबंध में दिए हैं। बाल्मीकीय रामायण में अयोध्या नरेश त्रुशंकु की कथा आती है त्रिशंकु प्रथम तो अपने कुलगुरु के पास जाकर सशरीर स्वर्ग में जाने की इच्छा प्रकट करता है जब वशिष्ठ जी मना कर देते हैं तो वशिष्ठ पुत्रों के पास जाकर निवेदन करता है तो वशिष्ठ पुत्र त्रिशंकु को इस प्रकार से शाप देते हैं कि वह चाण्डाल हो जाता है। "अथ रात्र्यां व्यतीतायां राजा चाण्डालतां गतः, नील वस्त्रों नील पुरुषो ध्वस्त मूर्धज:! चित्य माल्यांग रागश्च, आयसा भरणोभवत् । तदन्नतर रात व्यतीत होते ही राजा त्रिशंकु चाण्डाल हो गए। उनके शरीर का रंग नीला हो गया। कपड़े भी नीले हो गये। प्रत्येक अंग में रूक्षता आ गयी। शिर के बाल छोटे-छोटे हो गये।सारे शरीर में चिता की राख-सी लिपट गयी। विभिन्न अंगों में यथा स्नान लोहे के गहने
पड़गए। इसलिए नीले वस्त्र पहनना चाण्डाल का लक्षण होता है चाण्डाल राक्षस लोग ही इस रंग
को पसंद करते हैं क्योंकि जैसी जिसकी भावना होती है वह बाह्य परिधान भी वैसा ही ग्रहण करेगा। बिश्नोईयों को तो चाण्डालता से निवृतकरके देव तुल्य बनाया था इसीलिए सफेद या अन्यरंग नीले को छोड़कर पहनने की आज्ञा दी थी। क्योंकि वस्त्रों का प्रभाव भी मन बुद्धि शरीर
स्वभाव पर बहुत ज्यादा पड़ता है। सभी की अपनी-अपनी ड्रेस(परिधान) होता है। उससे समाज पर प्रभाव विशेष पड़ता है। सेना, वकील, जज, भक्त, साधु, संन्यासी इन्हीं की अपनी-अपनी पोषाकें हैं
जिससे भावनाओं पर सीधा असर पड़ता है। यदि आप नीले वस्त्र धारण करेंगे तो आपके अंदर चांडालता, राक्षस, दुष्टपना अवश्य ही आयेगा। और वही आप यदि भक्त, साधु, सज्जन पुरुष का सौम्य शुभ्र, पीत या लाल वर्ण के कपड़े पहनेंगे तो आपका प्रभाव भावनायें अति उत्तम होगी। इसीलिए राक्षसी परिधान त्याग करके भक्त का यह सफेद वस्त्र पहनना गुरु जी ने बतलाया था।
कुछ वैज्ञानिक लोग नीले वस्त्र में दोष बतलाते हुए कहते हैं कि यह हिन्दुस्तान गर्म देश है इसमे
गर्मी अधिक पड़ने का कारण सूर्य की किरणें यहां पर सीधी पड़ती हैं और वे किरणें नीले रंग की ओर आकर्षित ज्यादा ही होती हैं। सूर्य की किरणों से विपरीत रंग होता होता है जिससे सूर्य की किरणों को नीला वस्त्र खींचता है। जिससे गर्मी ज्यादा लगेगी। नीले वस्त्र से छनकर आयी हुई गर्मी स्वास्थ्य के लिए अति हानीकारक होती है तथा सफेद वस्त्र पर सूर्य की किरणें अपना प्रभाव नहीं डाल सकती वस्त्र पर पड़ते ही फिसल जाएगी शरीर तक अपना प्रभाव नहीं जमा पाएगी और यदि यत्किचिंत जमाती है तो भी शरीर के लिए स्वास्थ्यवर्धक ही होती है। इसीलिए सफेद वस्त्र ही धारण करना चाहिए नील वस्त्र सभी दृष्टियों से हानीकारक सिद्ध हुआ है। नीले या काले वस्त्र में मेल गंदगी अपवित्रता का साम्राज्य होता है। क्योंकि वहआँखो से तो दिखाई नहीं पड़ता है सफेद वस्त्र में मेल छिपाने की गुंजाइश जरा भी नहीं होती।सफेद वस्त्रों से भक्त की पहचान होती है और नीले वस्त्रों से चाण्डाल दृष्टता की पहचान होती है। इसीलिए जम्भदेव जी ने जब बिश्नोई बनाए थे तब सभी के लिए यह नियम लागू करते हुए बताया था कि अब आप लोग भक्त सज्जन हो चुके हैं आपकी पहचान सफेद वस्त्रों द्वारा होगी। आप लोग हृदय की कालुष्यता त्याग चुके हैं तो अब
वस्त्रों की कालुष्यता भी त्याग दीजिए। यही नील वस्त्र त्याग रूपी नियम को बताने का उद्देश्य था और यह नियम सर्वथा शास्त्र सम्मत, वैज्ञानिकों की कसौटी पर खरा उतरने वाला है यदि इसके संबंध में संदेह होता है तो अवश्य ही विचार करके देखिए समाधान मिलेगा।

विशेष:- इस प्रकार से उन्नतीस नियमों की व्याख्या पूर्ण होती है तथा उन्नतीस नियमों के अंत में एक दोहा भी कहा है जो बहुत ही महत्वपूर्ण हैं--

उन्नतीस धर्म की आखड़ी, हिरदै धरियो जोय।
जाम्भे जी किरपा करी, नाम बिश्नोई होय॥



साभार: जम्भसागर
लेखक: आचार्य कृष्णानन्द जी
प्रकाशक: जाम्भाणी साहित्य अकादमी 



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