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बिश्नोई समाज का बाईसवां नियम (रसोई) भावार्थ सहित || Explaintion of Twenty second rule of Bishnoi society

बिश्नोई समाज का बाईसवां नियम (रसोई) भावार्थ सहित || Explaintion of Twenty second rule of Bishnoi society

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भोजन स्वकीय जाति के लोगों के हाथ का बना हुआ ही करना चाहिए। सर्वप्रथम जब गुरु जम्भेश्वरजी महाराज के शिष्य बिश्नोई बने थे, तब उनके सामने यह समस्या आ गई थी कि जो अपने पीछे परिवार के लोग बिश्नोई नहीं बने हैं उनके साथ भोजन कैसे किया जा सकता है क्योंकि उनकी क्रिया, आचार-विचार शुद्ध नहींथे। उन्होंने उन्नतीस नियम धारण नहीं किए हैं, उनसे पला भी नहीं छुवाना है। वे लोग आपकीमंडली में सम्मिलित नहीं हुए हैं इसलिए तुम्हारे लिए पराये हैं। उस समय यदि वह नियम न बतलाते तो यह पंथ आगे चल ही नहीं पाता। इस समुदाय की कोई मर्यादा ही स्थिर नहीं हो पाती क्योंकि तब तो बिश्नोई भीमांसाहारी, नशेड़ी, अपवित्र घरों में भोजन करेगा तो फिर नियमों का पालन कैसे करेगा। खानपान से ही सम्पूर्ण व्यवस्था बिगड़ जाती है और खानपान शुद्ध होता ए तो सब कुछ सुचारु रूप से चलता है। इसलिए गुरु महाराज ने कहा कि अब आप लोग सभी एक समाज में एक गुरु की छत्रछाया में तथा उन्नतीस धर्म नियमों की मर्यादा में बंध चुके हो। इसलिए खानपान की व्यवस्था भी एक समाज में अपने जैसे लोगों के हाथ का किया करो। चाहे वह प्राचीनकाल हो या वर्तमान समय, भोजन जल तो शुद्ध होना ही चाहिए। इसी बात को प्रत्येक व्यक्ति सहर्ष स्वीकार करेगा ही। अपवित्र स्थानों में अनजान जगहों पर भोजन जलादि ग्रहण करने से शरीर में अनेक बीमारियाँ फैल जाती हैं, मन में चंचलता तथा बुद्धि विकृत हो जाती है। जैसा खावे अन्न वैसा हो जावे मन, जैसा पीये पाणी वैसी बोले वाणी। यही कहावत चरितार्थ होती है। इसलिए प्रत्येक बिश्नोई के घर का विश्वास है वह कभीमांसाहारी नहीं होगा। अन्य लोगों के घर जहाँ पर धर्म नियमों का पालन नहीं होता है वहां का अन्न जल ग्रहण न करें, यही जम्भदेवजी की आज्ञा है।


साभार: जम्भसागर
लेखक: आचार्य कृष्णानन्द जी
प्रकाशक: जाम्भाणी साहित्य अकादमी 



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