बिश्नोई समाज का छब्बीसवां नियम (तम्बाकू) भावार्थ सहित || Explaintion of Twenty sixth rule of Bishnoi society.

बिश्नोई समाज का छब्बीसवां नियम (तम्बाकू) भावार्थ सहित || Explaintion of Twenty  sixth rule of Bishnoi society. 


खाने पीने सूंघने के रूप में तम्बाकू का प्रयोग कदापि नहीं करना चाहिए। ऐसी भयंकर हानीकारक वस्तु को गधे भी नहीं खाते किन्तु वाह रे मानव ! तूने इसका कई प्रकार से प्रयोग करना प्रारंभ कर दिया है। आज तक तो इतिहास साक्षी है कि कोईभी तम्बाकू का सेवन करने वाला न तो स्वयं सुख शांति को प्राप्त हुआ है और न ही अपने पड़ोसी को सुख शांतिपूर्वक रहने दिया है। सर्वप्रथमतो तम्बाकू से अपने मन बुद्धि तथा शरीर को स्वयं कमजोर करता है और बाद में तम्बाकू की दुर्गंध से समीपस्त जनों को भी दूषित कर देताहै। प्राचीनकाल में तो गुरु जम्भेश्वर भगवान ने इस महान कोढ से अवगत करवाकर सदा ही इससे अपनी रक्षा करने का उपाय बतलाया था। सभी को पाहल देकर प्रतिज्ञा करवायी थी। धीरे-धीरे समय पाकर आज इसने पुनः भयंकर रूप धारण कर लिया है। इससे सम्पूर्ण विश्व के वैज्ञानिक, डॉक्टर,मनीषी बहुत ही चिंतित हो चुके हैं। नयी-नयी कानूनें बनवातेहैं, चेतावनी देते हैं, कि यह नशा ही मानवता की मौत का = संदेश है। इसीप्रकार यदि सभी लोग इस नशे के चक्कर में पड़ते रहे तो वह दिन दूर नहीं है जिस दिन मानवता नष्ट हो जाएगी। ये बने हुए एटम बम तो न जाने कब टूटेगे। इससे पहले ही यह तम्बाकू आदि का नशा मानवता को नष्ट कर देगा। इसलिए आजकल कई देशों में सामूहिक रूप से लोग नशे को छोड़ रहे हैं। ऐसा ही दुःख जाहिर किसी विद्वान ने किया है। उन्हीं के शब्दों में- "तम्बाकू और इंसान दोनों एक दूसरे को खाते हैं" बस यों ही खाया था मीठा पान और अब ? अब तो तम्बाकू सिगरेट की आदत छूटती ही नहीं। लेकिन मात्र लाचारी जाहिर करने से इस सच

को झूठलाया नहीं जा सकता कि स्वाद के नाम पर लिया गया तम्बाकू या तनाव घटाने के बहाने पी गयी सिगरेट के हर पैकेट के साथ आप जिंदगी को उस चौराहे की ओर ढकेल देते हैं, जहाँ से हर रास्ता आपको मौत के करीबले जाता है।

साभार: जम्भसागर
लेखक: आचार्य कृष्णानन्द जी
प्रकाशक: जाम्भाणी साहित्य अकादमी 



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