प्रेरक कहानी पर्यावरण को साफ सुथरा रखने वाले जुनूनी इंसान श्री खम्मू राम बिश्नोई (खीचड़) की

 प्रेरक कहानी पर्यावरण को साफ सुथरा रखने वाले जुनूनी इंसान श्री खम्मू राम बिश्नोई (खीचड़) की 

पर्यावरण को साफ सुथरा रखने वाले जुनूनी इंसान श्री खम्मू राम बिश्नोई (खीचड़)


श्री खम्मू राम बिश्नोई (खीचड़)


जोधपुर शहर की आबादी जयपुर के बाद घनी आबादी वाला शहर है। चारों ओर आसमान छूने को बेताब कंकरीट के जंगल। लेकिन ऐसे चंद लोग ही यहां निवास करते हैं जिनकी रूचि प्रकृति के वास्तविक जंगल की सुध लेने में है। इनमें से एक हैं खम्मू राम खीचड़। जो गली-मौहल्लों से लेकर विभिन्न समाज के लगने वाले छोटे-मोटे धार्मिक मेलों में लोगों द्वारा फैंके गए पॉलीथीन के कचरे को बीनते मिल जाएंगे। जिस ओर पॉलीथीन दिखती हैं उनके कदम उस ओर मुड़ जाते हैं। अब उनके इस मिशन का कारवां बढ़ता जा रहा है। उनकी प्रेरणा से कई पर्यावरण सेवक मेलों में पॉलीथीन का कचरा बीनते नजर आ जाते हैं। इनकी अपनी अलग से एक टीम व संगठन है।

पर्यावरण को साफ सुथरा रखने वाले जुनूनी इंसान श्री खम्मू राम बिश्नोई (खीचड़)


पर्यावरण संरक्षण के लिये बनी इनकी टीम में देश के विभिन्न भागों के लोग कार्यरत हैं । जो निःशुल्क सेवा-भाव से इस कार्य से जुड़े हुए हैं। छोटे से गांव एकल खोरी तहसील ओसिया

जिला जोधपुर में किसान कानाराम के घर खम्मू राम खीचड़ का जन्म 20 फरवरी 1966 को हुआ। आठ बहन-भाईयों वाले भरे-पूरे परिवार में जन्मे खम्मू राम वाणिज्य से स्नातकोत्तर है तथा जोधपुर न्यायालय में वरिष्ठ न्यायिक सहायक के पद पर कार्यरत हैं। इनकी धर्मपत्नी का नाम जमना देवी है जो कि गृहिणी है। पर्यावरण संरक्षण के कारण खम्मू राम की पहचान अब अपने क्षेत्र ही नहीं बल्कि विश्व स्तर पर पहुंच चुकी है। लोग खम्मुराम खीचड़ को अन्तर्राष्ट्रीय पर्यावरण प्रेमी के नाम से पुकारते हैं। अपने ढंग से धरती को प्रदूषण से बचाने की उनकी इस पहल को अब हजारों हाथों का साथ मिल गया है। यह साथ औरों को बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। इस तरह के व्यक्ति गिने चुने ही मिलेंगे जो आज के भौतिकवादी दौर में भी सड़क पर पड़े पॉलीथीन के कचरे को उठाने में अपने जीवन का मकसद तलाशते हैं।


खम्मू राम जी ने बताया कि वर्ष 2004 में एक विदेशी चैनल पर बिश्नोई समाज के पर्यावरण संरक्षण को दर्शाने वाली फिल्म के आखिर में दी गई व्यंग्यात्मक टिप्पणी ने उन्हें झकझोर कर रख दिया था। उसी दिन से उन्होंने यह प्रण लिया कि वे अपने आसपास की धरा को पॉलीथीन कचरे से मुक्त करेंगे इसी को उन्होंने जीवन का एक ध्येय बना लिया। शुरूआत 3 अक्तूबर 2005 को मुक्ति धाम मुकाम से की। उसके बाद से वे हर मेले के परिसर को स्वच्छ बनाए रखने के लिए अपनी टीम के साथ पहुंच जाते हैं।

जब कचरा बिनते खम्मू राम पर लोग फब्तियां कसते

खम्मूराम ने बताया कि शुरूआती दौर में इनके इस जुनून पर लोगों ने तरह-तरह की फब्तियां कसी। लेकिन वे निराश नहीं हुए। फिल्म में की गई टिप्पणी बार-बार उनके जेहन में आती रही। उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और जुटे रहे पॉलीथीन हटाओ मिशन पर। समाज से भी अपेक्षित सहयोग नहीं था। कई बार वे लोगों में हंसी के पात्र बने। लेकिन उन्होंने हर बार श्री गुरू जम्भेश्वर भगवान से इस मिशन में कामयाब होने का आशीर्वाद मांगा। लोगों को पॉलिथीन के सम्बन्ध में जागरूक करने के लिए अपने सहयोगियों के साथ तरह-तरह के स्वांग धरते, नाचते-गाते. अलग-अलग स्लोगन लिखी तख्तियों को गले में टांगकर मेले में घुमते और लोगों को पॉलिथीन की थैलियों का प्रयोग ना करने तथा अन्य कचरा खुले में ना फैंकने के लिए प्रेरित करते। उन्होंने दुकानदारों से मेला स्थल पर पॉलीथिन का उपयोग न करने की अपील की उनसे शपथ पत्र भरवाए। खुद के खर्चे से कागज व कपड़े की थैलियाँ बांटी। पौधारोपण किया और शादियों में पौधे भेंट किए तथा घर-घर जाकर पौधे बांटे ।

खम्मू राम बिश्नोई अपने व टीम के प्रयास से प. राज. से लेकर देश के विभन्न मेलों को प्लास्टिक मुक्त रखते हैं.

श्री बिश्नोई के इसी जुनून का परिणाम है कि आज बिश्नोई समाज में मेलों यथाः मुक्तिधाम मुकाम, समराथल, खेजड़ली शहीदी मेला. शहीद गंगाराम मेला (चारा और नेहड़ा) के अलावा लोक देवता बाबा रामदेव का रामदेवरा, जोधपुर का सिद्धनाथ मेला, शीतला माता मेला, परशुराम मेला व जूना खेड़ा बालाजी मेला परिसर की धरा पॉलीथीन से मुक्त है। उन्हें शुरुआती दौर में मुकाम मेले में कठिनाई हुई लेकिन उनके प्रयासों से आज वहां कपड़े की थैलियाँ उपलब्ध करवाई जा रही हैं। यही नहीं, मुक्ति धाम मेले में महासभा द्वारा उन्हें पर्यावरण प्रभारी बनाया गया।

विभिन्न सामाजिक संगठनों ने किया सम्मानित, वैश्विक स्तर पर फ्रेंक वागेल ने खम्मूराम के कार्य को दिलाई पहचान.

उनके गाँव वालों को न केवल अपने लाडले पर गर्व है बल्कि विभिन्न संस्थानों ने उनके जोश व जुनून को पुरस्कारों से नवाज कर पीठ थपथपाई है। अब तक उन्हें जिला प्रशासन, मेहरानगढ़ ट्रस्ट; वीर दुर्गादास राठौड़ सम्मान, आध्यात्मिक पर्यावरण संस्थान, अखिल भारतीय बिश्नोई महासभा व जीव रक्षा सभा, पाबोलाव धाम व खेजड़ली शहीदी मेले में पुरस्कृत किया जा 3चुका है। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर खम्मू राम को पहचान दिलाने का श्रेय फ्रांस के पर्यावरण शोधकर्ता फ्रेंक वागेल को जाता है। फ्रेंक वागेल 2005 में जब सम्मराथल धोरा पहुंचे तो बहां हजारों की तादाद में बिश्नोई धर्मानुयायी मिले। इस भीड़ में एक चेहरा ऐसा भी था जिसका ध्यान जयकारों की गूंज की ओर नहीं था बल्कि लोगों के हाथों की ओर था। जब लोग पॉलीथीन फैंकते तो उन्हें उठाने में मसगूल था। अगले वर्ष जब फ्रेंक वागेल दोबारा भारत आए तब भी हजारों की भीड़ में वह चेहरा फिर से नजर आया। इस बार वागेल खम्मू राम के कचरे बीनते की फोटो उतारकर अपने साथ ले गए। जब वागेल 2007 में तीसरी बार समराथल धोरे पर आए तो खम्मूराम फिर से कचरा बीनते मिले। इस पर वागेल ने खम्मू राम से बातचीत की। खम्मू राम के मिशन के बारे में सुनकर वे भी दंग रह गए। उन्होंने खम्मू राम के प्रण को विश्व पटल पर अनुकरणीय बनाने में सहयोग दिया। वागेल ने खम्मू राम के कार्यों की डॉक्यूमेंट्री बनाई, जिसमें वैज्ञानिक तर्कों व तथ्यों कसौटी पर दर्शाया गया कि प्लास्टिक प्रकृति व मानव के लिए कितना खतरनाक है और खम्मू राम कैसे इसके विरूद्ध अपना अभियान चला रहे हैं। यह डॉक्यूमेंट्री फिल्म इंटरनेशनल प्लेनेट वर्कशॉप में दिखाई गई और यहीं से उन्हें पर्यावरण संरक्षण के लिए अपनी सोच को दुनिया तक पहुंचाने का अन्तर्राष्ट्रीय मंच मिला। खम्मू राम को पहली बार 13 दिसम्बर 2008 को कोर्चेवेल सिटी, पेरिस, फ्रांस में हुई तीन दिवसीय इंटरनेशनल प्लेनेट वर्कशॉप की ओर से आयोजित तीसरी ग्लोबल कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित किया गया इसके बाद खम्मू राम 2011 से 2014 में इंटरनेशनल प्लेनेट वर्कशॉप की ओर से आयोजित छठे, सातवें, आठवें और नौवें ग्लोबल कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेने फ्रांस जा चुके हैं। हाल की अपनी फ्रांस यात्रा के दौरान खम्मु राम ने फ्रांस के एफिल टावर के नीचे अपने पर्यावरण स्लोगन की प्रदर्शनी लगाकर दुनिया भर के लोगों को पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया।


पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में बिश्नोई समाज का योगदान अतुलनीय है लेकिन जो काम खम्मू राम ने जो प्रकृति बचाने को किया है वह शायद समाज के शीर्षस्थ संगठनों के अगुवा भी नहीं कर पाए। एक वक्त था जब कई तीर्थ स्थलों की ओरण भूमि की झाड़ियाँ पॉलीथीन से अटी रहती थी। लेकिन आज जब हम वहां से गुजरते हैं तो अनायास ही यह ध्यान में आ जाता है कि यहां भी खम्मू राम के कदम पड़े हैं। सच्चे अर्थों में श्री गुरु जंभेश्वर भगवान के प्रकृति संरक्षण सिद्धांतों पर खम्मू राम जैसे लोग ही खरे उतर पा रहे हैं।


जब सैंकड़ों कर्मचारी रोजाना आफिस से छुट्टी होने पर घर पहुंचने की जल्दी में रहते हैं। वहीं, राजस्थान उच्च न्यायालय में न्यायिक सहायक की नौकरी करने वाले खम्मू राम का रूख घर की ओर नहीं होता। वे सीधे पहुंच जाते हैं जोधपुर के एम.बी.एम. इंजीनियरिंग कॉलेज परिसर । जहां वे कतारबद्ध खड़े पेड़ों को सींचते हैं। खुद के लगाए गए पौधों को अपनी आंखों से बढ़ते देख उनका जोश दुगुना हो जाता है। फिर यहां से सड़कों के किनारे बिखरे पॉलीथीन के कचरे को बीनते-बीनते कब घर (पर्यावरण निवास-घर का नाम) पहुंच जाते हैं, ठीक से उन्हें भी पता नहीं चलता।


मूल लेख: शौधगंगा पार्टल


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