श्री कृष्ण भगवान एवं गुरु जाम्भोजी | संदीप धारणीया

 श्री कृष्ण भगवान एवं गुरु जाम्भोजी | संदीप धारणीया

श्री कृष्ण भगवान एवं गुरु जाम्भोजी
श्री कृष्ण भगवान एवं गुरु जाम्भोजी


धर्म व्यक्ति को जीवन जीने की सही राह बताता है और व्यक्ति में व्याप्त संभावनाओ को अंतिम परिणाम तक लेकर जाता है। अक्सर हर धर्म में जोर जीवन की नश्वरता, क्षण भंगुरता एवं स्वर्ग-नरक के भय पर रखा जाता है परन्तु अगर व्यक्ति एवं धर्म के हँसते हुए स्वरूप का दर्शन करना हो तो एक बार जीवन की आपाधापी को छोड़ श्री कृष्ण एवं जाम्भोजी के जीवन दर्शन पर चंद कदम चला जाये तो शायद जीवन सम्पूर्णता को पा सके। अक्सर हर धर्म में मुक्ति व मोक्ष पर बल मिलता है परन्तु उसकी तलाश के लिए जो रस्ते सुझाये जाते है। वे या तो मंदिरों मस्जिदों या गुरुद्वारों से होकर निकलते है या धर्मगुरुओं के जाल से परन्तु हकीकत में वे रस्ते कहीं जाते ही नहीं है। बल्कि वहीँ उलझ कर रह जाते है तो कुछ रस्ते जीवन से पलायन की सीख देते है परन्तु असल में धर्म को ऐसी बैसाखियों की जरुरत ही नहीं है बल्कि धर्म तो मनुष्य में एक चरित्र का निर्माण करता है ताकि मनुष्य खुश रह सके व जीवन को सही अर्थो में जी सके।
श्री कृष्ण एवं जाम्भोजी अतीत या वर्तमान के नहीं है बल्कि वे तो भविष्य के है वे मनुष्य में एक चरित्र विकास पर बल देते है जिससे मनुष्य हँसता हुआ रह सके व जीवन के गीत गा सके व सृष्टि के प्रति आदर भाव जग सके। जहाँ एक और अपने समय में श्री कृष्ण हँसते है गाते है बांसुरी बजाते है और मनुष्य व प्रकृति में एक संबध कायम करते है वहीँ जाम्भोजी भी धूर्त ब्राह्मणों व पाखंडियों के जाल में उलझे लोगो को निकाल  कर उनमे व्यक्तिगत सवतंत्रता व नेतिकता की उर्जा भर देते है, तथा प्रकृति में व्याप्त संगीत सुनने के लिए प्रेरित कर देते है। और जहाँ एक और श्री कृष्ण व्यक्ति में ब्रह्मांड की संभावनाओ को जगाते है वहीँ जाम्भोजी पुरे ब्रह्मांड  को ही कृष्णमय बताते हैं।
श्री कृष्ण जहाँ व्यक्ति को संघर्ष करने व हक़ के लिए लड़ने के लिए प्रेरणा से भर देते है वहीँ जाम्भोजी व्यक्ति को अच्छे कर्म करके जीवन को इतना श्रेस्ठ बनाने पर बल देते है की व्यक्तित्व अनुकरणीय हो जाये। अर्थात् श्री कृष्ण एवं जाम्भोजी एक ही है व युग की अवधारणाओं के हिसाब से व्याखान बदलते है परन्तु मूल भाव एक ही रहता है की मनुष्यता का विकास किया जाये व् धर्म को मनुष्य के जीवन के आचरण में ढाला  जाये इसलिए जाम्भोजी शब्दवाणी में बार बार कृष्ण चरित्र को जीवन में उतारने  पर बल देते है जिससे जीवन अपनी सम्पूर्णता को पा सके।
कृष्ण चरित्र बिन काचे करवे, रहो न रहसी पाणी (शब्द १) अर्थात् परमात्मा की कृपा के बिना इस शरीर में जीवन शक्ति नहीं रह सकती अर्थात जो लोग सवयं  को ईश्वर कहलाकर निर्जीव वस्तुओं में प्राण डालते है वे कृष्ण चरित्र को नहीं जानते व् दुनिया को मुर्ख बनाते है।
कृष्ण चरित्र बिन क्यूँ बाध बिडारत गाई (शब्द १४) अर्थात कृष्ण चरित्र हो तो गाय को बाघ नहीं मार सकता अर्थात यदि जीवन में सरलता हो तो उसे कृष्ण चरित्र से कायम रखा जा सकता है।
जातां हूंता पात करिलो यह कृष्ण चरित्र परिवानो (शब्द १५) अर्थात जाटों से शिष्य बना कर उन्हें सही राह दिखा कर भवसागर से पार उतार रहा हूँ यही कृष्ण चरित्र का परमाण है।
कृष्ण माया चोखण्ड क्रशानी जम्बूदीप चरिलो (शब्द २९) यह चौखंड ब्रह्मांड कृष्ण की ही माया है अर्थात् यह जगत कृष्णमय है और इसको समझना व्पाना ही जीवन का उदेश्य है।
जां जां बाद विवादी अति अहंकारी लबद सवादी। कृष्ण चरित्र बिन नाही उतिरबा पारु।। (शब्द ३२) जो लोग अति अहंकारी है लुब्ध स्वादी है और वाद विवादी है वे कृष्ण चरित्र को नहीं जानते तथा भवसागर से पार नहीं उतर सकते।
खेत मुक्त ले कृष्ण अर्थो जे कंध हरे तो हरियो (शब्द ३४) प्रत्येक कर्म को पूर्ण निष्ठा व् समर्पण भाव से करना व् साथ ही कृष्णार्पण करना ही जीवन है इसके लिए यदि काया का नाश हो तो होने दो।
घड़े उन्धे बरसात बहु मेहा, तिहीं माँ कृष्ण चरित्र बिन पड्यो न पडसी पाणी (शब्द ४२) अर्थात घड़ा यदि ओंधा है तो तो उसमे बहुत वर्षा होने पर भी पाणी नहीं ठहर सकता यदि कृष्ण की कृपा न हो अर्थात उलटे सीधे प्रयासों से भगवत्प्राप्ति नहीं हो सकती बल्कि जीवन में कृष्ण चरित्र होना जरुरी है।
विष्णु बिवाणे कृष्ण पुराने, कायं झखोते आल प्राणी ! (शब्द ५४) भगवन की भक्ति के लिए व्यर्थ के झूठ या बकवाद की जरुरत नहीं है बल्कि यह तो बिना वाणी के स्वयं में कृष्ण चरित्र को उतार कर भी हो सकती है।
तुआ दान जू कृष्णी माया, और भी फलत दानों ! (शब्द ५८) दान से लोग फलते फूलते है परन्तु कृष्ण की कृपा रूपी दान के बराबर कोई नहीं फलते फूलते।
तुआ राग जा कान्हड वाणी और भी कहिबे रागु (शब्द ६५) जाम्भोजी कहते है की जिस प्रकार कृष्ण की वाणी से अर्जुन का मोह नष्ट हुआ वैसे मोह वैराग्य की वाणी से नहीं हो सकता अर्थात उन्होंने सरल शब्दों में गीता के ज्ञान को ही श्रेष्ठ बताया है परन्तु उसे कृष्ण चरित्र से सरल बना दिया है।
हक़ हलालु हक़ साच कृष्णो सुकृत अहल्यो न जाई (शब्द ७०) सच्चे कर्तव्यों को कृष्ण चरित्र के अनुसार करने पर वे व्यर्थ नहीं जाते बल्कि फल अवश्य प्रदान करते है।
कान्हड़ होय बंशी बजायी गौऊ चराई धरती छेदी कलि नाथ्यो असुर मार किया क्षयकारी (शब्द ९४) जाम्भोजी कहते है की मैने ही कृष्ण के रूप में धरती को छेदा तथा वासुकी नाग को नाथा तथा गोवर्धन पर्वत को धारण कर असुरों को मार कर ब्रजमंडल की रक्षा की।
कृष्ण करंता बार न होई थल सिर नीर निवानो (शब्द ९८) उस कृष्ण को किसी कार्य को करने में देर नहीं लगती है वह रेत  के धोरे को परिपूर्ण तालाब बना सकते है।
कृष्ण माया तिहु लोका साक्षी अमृत फूल फलिजे (शब्द १०३) तीनो लोक कृष्णमय है वह सर्वत्र साक्षी रूप में विद्यमान है इसलिए सुकृत करके फलना फूलना चाहिए और परमतत्व की प्राप्ति करनी चाहिए ।
जाम्भोजी ने अपने जीवन में बार बार कृष्ण चरित्र का उलेख किया जिससे उन्होंने ना केवल कृष्ण चरित्र को सपष्ट किया बल्कि एक विश्नोई के जीवन को इतना सरल बना दिया की जिसमे व्यर्थ के पूजा पाठ तंत्र मन्त्र व् तथाकथित मोक्ष के दुर्गम राहों से पीछा छुड़ा दिया जिससे जीवन इतना सरल हुआ की हर व्यक्ति में धर्म का हँसता हुआ चेहरा दिखाई देने लगा. इसीलिए अक्सर हमे सच्चे विश्नोई जीवन की इन जटिलताओं से मुक्त हँसते हुए दिखाई देंगें।
जन्माष्टमी पर्व आ रहा है अत: आइये अपने जीवन को जाम्भोजी की शिक्षानुसार कृष्ण चरित्र बनाये जिससे धर्म को बोझिल होने से बचाया जा सके।

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