गुरु जाम्भोजी, मरूस्थलीकरण रोकथाम | Desertification | जय खीचड़

गुरु जाम्भोजी, मरूस्थलीकरण रोकथाम | Desertification 


मरूस्थलीकरण की समस्या समस्त विश्व में व्याप्त है । विश्व की जनसंख्या का छटवाँ हिस्सा इस समस्या से प्रभावित है । मरूस्थल का शाब्दिक अर्थ है - मृत भू भाग है । 

'मरूस्थलीकरण एक प्रक्रम है जो जलवायु के उतार-चढ़ाव, मानवीय प्रतिक्रियाओं और जैविक क्रियाओं द्वारा शुष्क, अर्द्ध-शुष्क एवं उपआद्र क्षेत्रों में बढ़ता है । (Desertification Is Land Degradation In Air, Semi-aird And Dry Sub-humid Areas Resulitng From Various Factors Including Climate Variations And Human Activities.)'1 

मरूस्थल प्रसार की क्रिया केवल प्राकृतिक कारणों से हो सकता है लेकिन इस बात के प्राप्त उदाहरण है कि प्रकृति मानव हस्तक्षेप [ वन उन्मूलन (Deforestation), अति चारण (Over Grazing), भूमि के अलाभप्रद उपयोग, भूमिगत जल की अत्यधिक निकासी (Improper Soil And Water Management) भूमि प्रदूषण (Land Pollution) ]जिससे जलवायु प्रदूषण के कारण इसे वर्तमान स्वरूप अर्थात् मुस्थल का रूप दिया ।

समुचित शब्दों में कहें तो प्राकृतिक संपदा के देन वृक्ष और वन्य जीव को पर्यावरण के प्रबंधन की देन समझने में हमारी असमर्थता ने ही मरू को वास्तविक वर्तमान रूप दिया है । मरूस्थलीकरण का प्रभाव न केवल यहाँ के जन-जीवन व पर्यावरणपर पड़ रहा है अपितु सम्पूर्ण देश के जन-जीवन एवं समुची मानव सभ्यता के लिए चुनौति बनता जा रहा है ।

 मरूस्थलीकरण की रोकथाम हेतु उपाय ।

      राजस्थान में मरूस्थलीकरण की प्रक्रिया विस्तृत एवं दीर्घकालीन है । मरू प्रसार के रोकथाम हेतु यहां कई सतत् प्रयास विभिन्न योजनाओं के संचालन द्वारा किये जा रहे है । ज्ञात इतिहास में यहां सर्वप्रथम मरू प्रसार के रोकथाम हेतु पर्यावरण वैज्ञानिक मध्य सदी के संत गुरु जाम्भोजी ने नींव रखी । मरूधर प्रदेश में अकाल व सुखे का चोली दामन का साथ है । मध्य सदी ( संवत् 1542 ) में भयंकर अकाल पड़ा । जिससे यहाँ के लोग मालव प्रदेश कि ओर प्रस्थान करने लगे । इस भयानक स्थिति में जाम्भोजी ने यहां के लोगों को पलायन करने से न केवल रोका बल्कि अपनी आलौकिक शक्ति से उनकी अन्न, जल व धन से सहायता भी की । यहीं से मरूस्थलीकरण के रोकथाम की पहली सुदीर्घ योजना ( संवत् 1542 में कार्तिक वदी अष्टमी को सम्भराथल धोरे पर कलश की स्थापना करके, उपस्थित जन समुह को पाहल देकर बिश्नोई पंथ की स्थापना की ) का उद्भव हुआ जो वर्तमान में क्रम निरतंर मरू प्रदेश में अपना स्थान बनाए हुए है । 

गुरु जाम्भोजी ने प्रकृति के हर पहलू का अध्ययन कर बिश्नोई विचार धारा जिसमें 29 नियम प्रतिपादित किये । इस विचार धारा के मूल में न केवल मानव कल्याण के तत्वों का समावेश है अपितु सम्पूर्ण जगत के चराचर जीवों के कल्याण की भावना निहित है ।

 गुरु जाम्भोजी ने सिद्धांतों में पारस्तितीक तंत्र के समुचित संरक्षण के उपायों का समावेश कर उन्हें बिश्नोइयों की जीवन शैली से जोड़ा । यथा - " जीव दया पालणी रूँख लीलो न घावै । अर्थाथ् संसार के समस्त जीवों पर दया भाव रखना व हरे वृक्षों को कदापि नहीं काटना । " पाणी बाणी ईंधनी लिजो छाण ।" अर्थात् पानी को छानकर प्रयोग में लेना फिर जीवों को जीवाणी करे, वाणी को हृदय रूपी छननी से छान कर बोलने को कहा जिससे सांस्कृतिक प्रदुषण (भाषिक जहर) न हो और ईंधन को छानना अर्थात् झिड़क कर प्रयोग में लेना जिससे अगर लकड़ी में कीट पतंगे हो तो उन्हें बचाया जा सके ।

यहीं से मरू के प्रसार की रोकथाम का व्यवस्थित, सतत् प्रयास शुरू हुआ । जिसका ज्वलंत उदाहरण "खेजड़ली" गांव की अमृता देवी का है जहां 363 लोगों ने वृक्षों की रक्षा के लिए 'गुरु जाम्भोजी' के सिद्धान्तों की प्रतिपालना करते हुए प्राणोत्सर्ग किया । वृक्षों की रक्षा की भावना ही नये वृक्षारोपण को प्रोत्साहन देती है ।

गुरु जाम्भोजी ने जीव दया के भाव से बिश्नोइयों में भेड़-बकरी के पालन को वर्जित किया जो भूमि के अपरदन से मरू विस्तार का एक महत्वपूर्ण पहलू है । 'मरू प्रदेश में वनों तथा घास के क्षैत्रों पर बड़ी संख्या में भेड़-बकरियों को चरने के लिए छोड़ दिया जाता है जो वनस्पति को अंतिम बिन्दु तक चरकर खोखला बना देती है जिससे बड़े पैमाने पर मृदा का अपरदन होता है ।'2 जो भूमि में उसरता व मरू प्रसार का एक पहलू है ।

गुरु जाम्भोजी ने अपनी वाणी द्वारा "करषण करो स्नेही खेती" स्नेह की खेती पर बल दिया अर्थात् बिश्नोई कृषक वर्ग को प्रकृति के वृक्ष व जीव साहचर्य को बनाये रखते हुए, कृषि योग्य भूमि पर ही कृषि को प्रेरित किया । यहां यह कहना उचित होगा कि जाम्भोजी ने प्रकृति व मानव के मध्य सखा भाव ( जगत में आपात सहायक व्यवहार ) का बीज बोया । जो निम्न पंक्तियों में दृष्टव्य है :

जीवन आधार जय,प्रकृति प्रेम समहार ।
प्रकृति पहले देह दे अनेक खाय प्रहार । ।

इसी सखा भाव के परिणाम आज भी बिश्नोई बहुल क्षैत्र प्राकृतिक संपदा को अक्षुण रूप में संजोये मरूस्थलीय भाग में मरू प्रसार रोकथाम की दीर्घकालीन व सफल योजना संचालित किये हुए है । वर्तमान में मरूस्थलीकरण कि समस्या विकट होती जा रही है जिसका प्रभाव देश के जनजीवन व पर्यावरण पर पड़ रहा है । वर्तमान में राज्य में "मरू विकास कार्यक्रम" जैसी अनेक योजनाएं मरू प्रसार रोकथाम हेतु केन्द्र व राज्य सरकार संचालित कर रही है । जिन्हें अंशतः सफलता भी मिली है । परन्तु ऐसी स्थिति में इस समस्या के निराकरण की अंतिम और श्रैष्ठतम विधि है जाम्भोजी की वाणी का अनुसरण । जो न केवल मरूस्थलीकरण प्रसार के रोकथाम में सहायक सिद्ध होगी अपितु प्राकृतिक संपदा के समुचित संरक्षण को बढ़ावा देगी ।
जाम्भोजी और मरूस्थलीकरण रोकथाम ।

संदर्भ:

  1. सन् 1992 में रियो-डी जेनेरो में आयोजित विश्व पर्यावरण सम्मेलन (UNCED) में मरूस्थलीकरण की बताई गई परिभाषा ।
  2. Geography Of Rajasthan. Page No. 36, डॉ एल आर भल्ला


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