तरु धरा के देव : नीलम खीचड़

तरु धरा के देव


भू-रूह से निकला है,
तरु परमार्थ काज ।
भू-रूह से जुड़ा रहे,
आजीवन तरु राज ॥

जीते-जी निर्मल रहे,
लदे प्रेम की साख ।
साख-साख की साख दे,
प्रेम नेम को राख ॥

राही को छाँव मिले,
रुक करते विश्राम ।
खग रहने को आसरा,
उनका पावन धाम ॥
तरु धरा के देव || नीलम बिश्नोई || Bishnoism
तरु धरा के देव



भू-रूह से प्रेम सिंचे,
अंबर से मेह खिँचे ।
मीठे मीठे फल लगे,
देख देख मन रीझे ॥

तरू धरा का मान है,
सिंचे ऊर पर धार ।
धरा धार तरु श्रंगार,
लगे हरी हरि हार ॥

पादप करके विषपान,
देता प्राण आधार ।
नीलकण्ड हर देव सदा,
तरु रूप हरे विकार ॥

एक तरु के खोने से,
जीवन बने दुःखदार।
एक तरु के होने से,
होता प्रेम संचार ॥

आओ मिल तरु लगायेँ,
करें जीवन साकार ।
तरु रोपण से मिलेगा,
हमें जीने का सार ॥

जीवन ज्योत जले फले,
यही तरू की रीत ।
'नीलम' भू पर देव तरु,
कर ले इनसे प्रीत ॥

- नीलम खीचङ

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