गुरु जम्भेश्वर जी द्वारा सैंसे जी का अभिमान खंडन | खंडित चिम्पी : जांगळू मंदिर

 गुरु जम्भेश्वर जी द्वारा सैंसे जी का अभिमान खंडन | खंडित चिम्पी : जांगळू मंदिर


एक समय समराथल पर विराजमान सतगुरु गुरु जम्भेश्वर जी ने नाथूसर गाँव एंव पांचू बीच में झींझाला धोरा पर जाने की इच्छा प्रगट की। उसी समय साथरियों भक्तों ने भी साथ ही चलने की प्रार्थना की। श्रीदेव जी ने सभी को साथ में चलने की आज्ञा प्रदान की। उसी समय सभी ने ही अपने ऊँठ और घोड़े आदि जोते और नाथूसर की तरफ चल पड़े। जब श्रीदेव जी अपनी भक्त-मण्डली सहित झींझाला धोरे पर आ गये और चारों तरफ के लोगों ने जब इसके बारे में सुना तो आसपास के गाँवों के दर्शनार्थी एकत्रित होकर आने लगे। सभी लोग जाति-पाति के भेद-भाव को छोड़कर अपूर्व श्रृद्धा-भाव एंव विश्वास से आ रहे थे। आते ही सर्वप्रथम श्री गुरु जम्भेश्वर जी के चरणों में प्रणाम करते और कुछ लोग अति-भावुक होकर अपने सुख-दुःख की बात श्रीदेव जी करते। अपनी-अपनी अभिलाषा लेकर अपार जन-समूह श्रीदेव जी के पास आ रहा था। इसी प्रकार नाथूसर गाँव वासी भी "सैंसे जी" के साथ हर्ष-ख़ुशी के साथ झींझाला धोरे पर पहुंचे।

सैंसे ने सर्वप्रथम श्री गुरु जम्भेश्वर जी के पास आकर कहा कि- हे देव ! यदि आपकी आज्ञा हो तो हम लोग जमात सहित आपके चरणों में प्रणाम करें और आपके प्रताप से पार(मुक्ति) पहुँच जाएँ। तब देव जी कहा कि- हे सैंसा ! आप लोग तैरने की योग्यता तो अवश्य ही रखते हैं, पर आप लोग अब तक तैरना नहीं जानते हैं। मैं तुम्हे तैरना सिखाने के लिए ही तो आया हूँ। इसी प्रकार अन्य बहुत से नर- नारियों ने भी अपनी भेंट श्रीदेव जी के चरणों में रखी। और पुरे दिन श्रीहरिदेव जी ने मुक्ति-जुक्ति का मार्ग बतलाया। इस प्रकार संध्या होने को आई। गाँवों की आगन्तुक जमात ने वापिस अपने घरों में जाने की आज्ञा मांगी। नाथूसर के सैंसे ने भी आगे बढ़कर हाथ जोड़े और कहने लगा कि- हे देव ! आपने बड़ी कृपा की जो हमारे जंगल में पधारे। हे गुरुदेव ! आप लोग अपनी मण्डली सहित अन्नपान करें और हम लोग वापिस अपने घर को जाएँ। अब रात्रि होने वाली है, हमें घर जाने की आज्ञा दीजिये। और कहने लगा कि- हे गुरुदेव ! आपने पूरी जमात को कुछ न कुछ सीख अवश्य ही दी है, मेरे लिए कुछ भी नहीं कहा। क्या मैं इस योग्य नहीं हूँ जो आपके वचनों का पालन कर सकूँ? श्री गुरु जम्भेश्वर जी ने सैंसे का भाव देखकर कहा कि- हे सैंसा ! 

" भाव भलै सूं दीजौ भीख, साम्य कह संसा आ सीख।"

भाव भक्ति से भूखे को भोजन देना यही तुम्हारे लिए शिक्षा है। सैंसे के मन में यह सीख जंची नहीं। सैंसा कुछ सोचने लग गया। न ही तो वो हाँ ही कह सका और न ही ना कह सका। साथरियों ने कहा कि- हे सैंसा ! जैसा सतगुरु जी कहते हैं वह ठीक ही कहते हैं, उनकी बात को स्वीकार करके पालन करे। श्रीदेव जी ने साथरियों से कहा कि- सैंसे ने मेरी बात सुनी तो अवश्य ही है पर इसको स्वीकार नहीं कर पा रहा है। यह भक्त तो अच्छा है किन्तु अंहकारी है थोड़ा। सैंसा कहने लगा कि- हे देव ! मैंने तो दान देते हुए सम्पूर्ण पापों को नष्ट(नाश) कर दिया है। मैं तो भाई-बन्धु, न्यात- जमात सब को एकत्रित करके इन्हें भोजन करवाता हूँ। हे देव ! मैं तो घर पर आये हुए अतिथि साधु-सन्तो को अच्छी प्रकार से भिक्षा देता हूँ। घर पर आये हुए अतिथि को ना तो मैं कभी कहता ही नहीं हूँ। आप भी मेरे घर को देखें। मेरे घर को सारा संसार जानता है। केवल आप ही नहीं जानते इसीलिए शायद आपने ऐसी बातें कही है। श्रीदेव जी ने सैंसे भक्त तथा उनकी मण्डली को जाने की आज्ञा प्रदान की और सैंसे के चले जाने के पश्चात साथरियों से कहा कि- हे भक्तों ! सैंसे का भण्डारा, अतिथि सेवा अवश्य ही देखूंगा जिसके बारे में सैंसा कहता है कि मैंने अब तक देखा ही नहीं है।

तब श्रीदेव जी ने अन्य ही रूप धारण कर लिया। दूसरा ही रूप, दूसरी ही बोली, दूसरी ही वेशभूषा। " सरसा सीस बधारया केशा " सिर के बाल बढ़ा लिए, श्री हरी ने पतरी-चिम्पी अपने हाथ में ले ली और इस प्रकार एक अलग ही रूप में ढल गए। अब भला भगवान की भक्ति के बिना कौन पहचान सकता है श्रीहरी देव को? अन्य किसी भक्त को अपने साथ में नहीं लिया। अकेले ही सैंसे के घर जाकर अलख जगाई। सम्पूर्ण संसार जिनके आगे भिक्षुक बनकर माँगता है वह जगत के पालनहार श्रीहरी आज सैंसे के घर भिक्षा के लिए पहुँच गए। भगवान की अहैतु की कृपा होती है तभी भगवान उनके अज्ञान जड़ित गर्व का भंजन करते हैं। सैंसा तो घर पहुंचा ही था, संध्या वेला(सांझ समय) थी। गुरु नियम का पालन करे हुए संध्या करने को बैठा ही था। जगत-पालनहार श्री हरी ने सैंसे के घर पर अलख जगाते हुए कहा- ""सत विष्णु की बाड़ी "" हे देवी ! विष्णु के नाम की भिक्षा दो आपकी बाड़ी हरी-भरी रहेगी। सैंसा अंदर संध्या कर रहा था। अंदर आवाज सुनी और कहने लगा कि- इस संध्या बेला में मैं क्या सुन रहा हूँ? होगा कोई कंगाल पुरुष, फलसा-किवाड़ बंद कर दो। सैंसे की आज्ञा को शिरोधार्य करके सैंसे की धर्मपत्नी दोड़कर सामने आई कि कहीं यह आँगन में न आ जाए, पहले ही इसे रोक जाए। सैंसे की नारी कहने लगी- मैंने तुझे देख लिया है तूं हमारे घर में प्रवेश के योग्य नहीं है। बाहर चल। श्रीदेव जी सैंसे की धर्मपत्नी की इच्छा समझली कि यह कुछ भी नहीं देगी किन्तु बिना कुछ प्राप्त किये वापिस भी तो नहीं जाना है, इसीलिए खिड़की को पकड़ लिया। और मन ही मन (नटखट-पन) से सोचा(विचार किया) कि अगर ये खिड़की छुट गयी तो फिर कुछ नहीं मिलेगा। यहाँ आना व्यर्थ ही हो जाएगा। सैंसे की धर्मपत्नी कहने लगी- हे साधु ! खिड़की पकडे क्यों खड़ा है? जिस प्रकार से कर्जा लेने वाला खड़ा रहता है, हमने तुम्हारे से कोई कर्जा तो नहीं लिया है ना? इसे छोड़ और अपना रास्ता देख। श्रीदेव जी ने तो जैसे खिड़की को और जोर(मजबूती) से पकड़ लिया हो और कहने लगे कि- हे लक्ष्मी ! तूं तो साक्षात् लक्ष्मी ह, विष्णु तुम्हारे से प्रसन्न है , मुझे खाली मत भेज। कुछ दान तो अवश्य ही दे, पहले भी आपने बड़े-बड़े दान दिए हैं, अभी-अभी देव जी के पास दान देकर झींझाला धोरे से लौटे हो। मैंने जब गाँव में प्रवेश किया और दानियों का घर पूछा तो सभी ने आप ही का घर बताया है। इसीलिए मैं आशा और विश्वास से आपके यहाँ आया हूँ, मुझे खाली हाथ मत भेजो, कुछ ना कुछ तो जरुर ही दें। सैंसे की धर्मपत्नी कहने लगी- बाहर चलो ! अपना काम करो और हमें भी करने दो। मैं आपकी बातों से रीझने वाली नहीं हूँ। पीछे हट जाओ। मुझे अपनी खिड़की बंद करने दो और ऐसा कहते हुए वो श्री देव जी को धक्का दे देती हैं, देवजी सहन कर लेते हैं। भृगु कि लात भी तो सहन कर ली थी। स्वयं श्री हरी विष्णु आज तो सैंसे के घर आये थे, घर में लक्ष्मी को प्रवेश दिलाने के लिए किन्तु संसार के व्यक्ति क्या जाने? अब तो खींचातानी होने लगी। आखिर जीव रुपी देवी थक गयी। उसे तो थकना ही था भला भगवान के सामने कब तक कोई टिके? ये सब देख वहीँ खड़ी एक दूसरी नारी कहने लगी कि- ये योगी तो हठीला है, हठ नहीं छोड़ेगा, इसे कुछ ना कुछ तो देना ही पड़ेगा। इस बड़पन में तो ख़ाक है जो एक साधु को एक रोटी भी ना दे सके। यह सब सुन सैंसे कि नारी ने विचार लगाया कि इसे क्या देना चाहिए? जिससे यह हमारा पीछा छोड़ दे। तब वह घर के अंदर गयी और "" खिचड़ी की खुरचण(हांडी के लगा हुआ बासी भोजन) "" कुड़सी(कड़छी) में भरकर ले आई और कहने लगी- हे हठीले योगी ! तुम्हारा पात्र-चिम्पी इधर करो तो मैं भिक्षा देती हूँ। श्री देव जी ने भिक्षापात्र आगे किया तो कुड़सी(कड़छी) में खिचड़ी की खुरचण लिए खड़ी सैंसे की नारी ने जोर से क्रोधवश(क्रोश के वशीभूत) कुड़सी(कड़छी) को पतरी-चिम्पी पर दे मारा जिससे उस पतरी-चिम्पी का एक किनारा खंडित हो गया किन्तु श्री देव जी इस प्रकार से भिक्षा लेने में तो सफल हो ही गए। देव जी भिक्षा लेकर वापिस चले गए, किन्तु कुछ ही दूरी पर जाकर वापिस लौट आये और दूसरी मांग पेश कर दी कि इस समय सर्दी पड़ रही है, तो एक ओढ़ण तो दीजिये। फिर सैंसे की नारी कहने लगी कि तूं कैसा साधु है जिसे समय का भी आभाष(ज्ञान) नहीं है, तेरे गुरु ने इसे यह भी नहीं सिखाया कि भिक्षा मांगने कब जाना चाहिए? अब बिना समय की भिक्षा मिलने पर भी संतोष नहीं हुआ जो अब वस्त्र भी मांग रहा है? तो श्री देव जी कहने लगे कि- हे देवी ! भिक्षा का कोई समय नहीं होता जब भूख लग जाए तभी भिक्षा याद आती है परन्तु इस भूख का कोई पता नहीं कि कब लग जाए? तथा वस्त्र तो जब सर्दी लगे तभी याद आता है। ऐसी बातें सुनकर सैंसा कहने लगा कि इसे जो भी देना है जल्दी देकर घर से विदा करो। फिर सैंसे की नारी कहने लगी कि- अभी तो इसको बाहर निकाला था किन्तु यह तो वापिस आ गया। भिखारी तो बहुत देखे पर इतना हठीला मैंने कभी नहीं देखा। सैंसे ने अपनी नारी की बात सुनकर कहा कि क्यों कलह मचाई है? यदि कुछ देना है तो दे दो नहीं देना तो ना कह दो। गाँव के लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे? सैंसे की नारी ने सैंसे की बातों को अनसुना कर दिया तो सैंसे ने ही एक ""आथर"" (वस्त्र विशेष) दे दिया और वहाँ से विदा किया।

इस प्रकार श्री देव जी सैंसे के घर से मिला "अन्न एंव वस्त्र" लेकर वापिस झींझाला आ गए। परब्रहम से साथरियों भक्तो ने पूछा- हे देव जी ! सैंसे की वार्ता बतलाओ। भक्तों के भाव को देखकर देव जी ने टूटी हुई पतरी-चिम्पी में सैंसे के घर से मिला अन्न एंव वस्त्र दिखलाया। और कहने लगे कि मुझे खाने के लिए यह भिक्षा मिली है। और सैंसे ने मुझे यह सोड़ उढाई है।

रात्रि व्यतीत हुई। दुसरे दिन प्रातःकाल ही गाँवों के मतवाले भक्तजन आने लगे। साखी, शब्द हरिजस गाते हुए, झींझा बजाते हुए प्रातःकाल ही जमात एकत्रित हो गयी। बहुत से लोग श्री देव जी के दर्शन करने आ रहे थे। विशेष रूप से वो जिनका भाग्य-सौभाग्य में बदल चुका था। स्त्री, पुरुष, बच्चे अनेकानेक यथा रूप श्रृंगार करके आ रहे थे। आकर श्री हरी देव जी के आगे शीश झुकाते और यथास्थान बैठ जाते। ऐसा आभाष हो रहा था जैसे मानो वन(जंगल) में ही नगरी बस गयी हो। भेदभाव से रहित चाकर-ठाकर एक से ही प्रतीत हो रहे थे। जो भी श्रीदेव जी के दर्शन करता वह उनको अपने सम्मुख ही देख रहा था। किसी को भी श्रीहरी देव जी कि पीठ नहीं दिखाई दे रही थी। मानव-मात्र ही नहीं पशु-पंखेरू भी श्रीहरी देव जी के सम्मुख आकर पवित्र हो गए थे। नाथूसर निवासी भी "सैंसे जी" के साथ उसी प्रकार से पहुंचे। सभी ने श्री देव जी के सम्मुख शीश झुकाकर उनको प्रणाम किया और यथास्थान बैठ गए। दिनभर सत्संग कार्य चलता रहा। पुनः सायंकाल हुआ, सूर्यास्त होने जा रहा था। पहले कि भांति(तरह) सैंसे ने फिर कहा कि- हे देव ! दिन व्यतीत हो चुका है, रात्रि का आवागमन होने जा रहा है। हमें क्या शिक्षा है? जमात हाथ जोड़े खड़ी है। श्री गुरु जम्भेश्वर जी ने पुनः कहा-

"सतगुरु नाम इम द्यो भीख, साम्य कह संसा आ सीख।"

हे सैंसा ! सतगुरु परमात्मा के नाम से भीक्षा देना, तेरे लिए यही शिक्षा है। सैंसा कहने लगा- हे सतगुरु ! आप बिना सोचे-विचारे एक ही बात मुझे बार-बार क्यूँ कहते हो? वैसे मैं क्या समझता नहीं हूँ? सैंसे ने तब जोर देकर कहा कि- मैं आपके नाम से आपको ही समर्पण करके भिक्षा देता हूँ, प्रेमभाव से भोजन करवाता हूँ। जो मेरे पास मेरे घर आता है, उसको मैं खाली हाथ उत्तर नहीं देता हूँ। हे देव ! मेरा क्या है सब कुछ आपका ही है और आपके नाम से खर्च/खपत भी करता हूँ अर्थात आपके नाम से बाँटता(दान) भी हूँ।

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तब गुरु जम्भेश्वर जी ने अपने साथरियों भक्तों में से एक भक्त से कहा कि- तुम सैंसे के घर से लायी हुई भिक्षा तथा सोड़ लाकर दिखाओ। गुरु जम्भेश्वर जी ने सैंसे के घर से लायी हुई भिक्षा तथा सोड़ सैंसे को दिखाते हुए कहा कि- हे सैंसा ! "" ए सहनाण पिछाण"" जब सैंसे ने साथरी भक्त के हाथ में टूटी हुती पतरी-चिम्पी एंव आथर वस्त्र देखा तो तुरंत पहचान गया।

मूंधे मुंह सैंसो पड़यो, साम्भल सके ना कोय।

तब सैंसा अपने मुंह(मुख) को धरती पर रखते हुए गिर गया। सामने देख भी नहीं सका। विलाप करने लगा कि- मेरे घर साक्षात परब्रहम स्वंय चलकर आये और मैं उनकी सेवा नहीं कर सका, सेवा तो न की सो न की उल्टा उन्हें अपमानित भी किया। और कहने लगा कि हे धरती माता ! तूं फट जा कि मैं तुम्हारे में समां जाऊं। अब तो मैं किसी को मुंह दिखाने के लायक भी नहीं रहा। यदि सांसारिक कार्य ओ छोड़ भी देता तो श्री हरी जी संभाल लेते, पर मैंने तो श्री हरी का ही तिरस्कार कर दिया है इसीलिए मुखे बचाने वाला तो अब कोई नही है। सैंसा इस प्रकार से विलाप करता हुआ अचेत हो गया। तब वहीँ बैठे भक्तों ने गुरु जी से प्रार्थना की कि हे नाथ/देव ! यदि आपने भी इसका हाथ छोड़ दिया तो यह जड़ मूल से ही चला जायगा। यह तो अब आपके सामने नहीं देख सकेगा। आपसे प्रार्थना भी नहीं कर सकेगा। किन्तु आप हमारी अर्ज़ अवश्य ही सुनो। तब श्री गुरु जम्भेश्वर जी ने कहा कि-

""उठ सैंसा सतगुरु कहे, गर्व न करो लिंगार।""

हे सैंसा ! अंहकार ना करो और खड़े हो जाओ। गुरु जी के वचन सुनकर जैसे सैंसे में एकदम से नये प्राण आ गये हो। सैंसा उठ खड़ा हो गया और हाथ जोड़कर विनती करने लगा- कि देवाधिदेव ! आपने मुझे बचा लिया है अन्यथा मैं तो अंहकार के पंक(दलदल) में डूब ही जाता। मुझे तो मेरी इस अज्ञानता का पता ही नहीं था। आपने मेरी आँखे खोल दी है। अब मैं मेरे गर्व को छोड़कर आपके ही अधीन हूँ। आप ही की आज्ञा का पालन करूँगा। सैंसा पुनः सवस्थ हुआ। सतगुरु ने सैंसे को माफ़ कर दिया। उपस्थित जनसमूह ने जय-जय कार की। सैंसे के भाग्य की और गुरु जम्भेश्वर जी की दयालुता सराहना की। इस प्रकार से गुरु जम्भेश्वर जी ने भक्त सैंसा का अंह-भाव को दूर किया। यह खंडित पतरी-चिम्पी आज वर्तमान में जांगलू के मंदिर है रखी हुई है।

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