महिला सशक्तिकरण, नारी अपनी शक्ति को पहचाने | Bishnoism.Org

 महिला सशक्तिकरण, नारी अपनी शक्ति को पहचाने

महिला सशक्तिकरण, नारी अपनी शक्ति को पहचाने | Bishnoism.Org | नीलम खीचड़


 - नीलम खीचड़ |

महिला सशक्तिकरण को लेकर संसद से लेकर समाज की दहलीज तक हंगामा हो रहा है। जोर-शोर से दावे किए जा रहे हैं कि सरकारी नौकरी और निर्वाचन क्षेत्र में महिलाओं को आरक्षण देने से महिलाओं में अपनी क्षमता को पहचानने की शक्ति जाग्रत होगी और वे अपने आपको सशक्त महसूस करेगी ये सराहनीय प्रयास है। महिला साक्षरता का आंकड़ा निरन्तर चरम शीर्ष को प्राप्त हो रहा है। लेकिन आज भी महिला उत्पीड़न कम नहीं हुए हैं। महिलाओं को कहीं दहेज के लिए तो कहीं रुढ़िवादी परम्पराओं की शिकार बनाया जाता है। इस दिशा में एक प्रयास जो महिलाओं पर दयाभाव के स्थान पर समानता को बढ़ावा देगा वह महिला वर्ग को खुद स्वावलंबी आत्मनिर्भर और साहसी बनना होगा। उसे न केवल स्वयं को अबला से सबला बनाना होगा बल्कि समाज में हर क्षेत्र में पुरुषों से कंधा मिलाकर अपना वर्चस्व स्थापित करना होगा। जिसमें न तो महिला वर्ग अपने को हेय या अबला समझेगी और न ही पुरुष वर्ग अपने पर उसकी आश्रितता के भार से होकर उन पर जुल्मों का कहर ढहाएगा। इसमें मुद्दे की बात यह है कि अगर महिलाएं अपनी सम्पूर्ण पारिवारिक व सामाजिक दायित्वों के साथ आत्मनिर्भर बनेंगी तो वे अपने कौशल को अपनी रुचि क्षेत्र में लगाकर आर्थिक मदद करने की कोशिश करें तो सकारात्मक परिणाम सामने होंगे। हालांकि आज समाज के प्रत्येक वर्ग में महिला की भागीदारी बढ़ी है फिर भी विषमता अपने चरम बिंदु पर है।


आज एक और तो महिलाएं भौतिक परिवेश में बढ़-चढ़कर खुद को साबित कर रही हैं परंतु दूसरी तरफ अर्थात् कहने का भाव यह है कि हमें सादगीपूर्ण जीवनयापन कर अपने अतिरेक को पिछड़े क्षेत्र में लगाकर उन्हें भी प्रगति की ओर प्रवृत करना चाहिए। पर शायद यह एक विकसित और प्रगति की कल्पना मात्र है। क्योंकि आज की यथार्थं स्थिति कुछ और है। आज अहंकार 'मैं ही हूँ होशियार, समृद्ध और समझदार' वाली स्थिति है और तो और सहानुभूति सद्भावना व पारस्परिक प्रेम भावना के शब्द हिन्दी शब्दकोष के पुराने शब्द हो गए हैं। इसलिए इनका प्रयोग प्रचलन से बाहर हो रहा है। यह समझना आवश्यक है कि 

व्यक्ति अगर वक्ता है तो महिला सृजनकर्ता है। संसार की समस्त शक्ति का संचरण महिला से ही है।


आज दहेज उत्पीड़न का दृश्य समाज के हर वर्ग में व्याप्त है तो क्या इसके लिए महिला सिर्फ अपनी सहनशीलता का परिचय देती रहेगी और चुपचाप यह साबित करती रहेगी कि वह पराये घर का धन है जो ब्याज सहित लौटाना पड़ता है। इस धन को प्रश्रय देने वाला (माता-पिता) बर्बाद या बोझिल होगा। दहेज विरोधी कानून से समस्या का निवारण संभव नहीं है। समस्या आज भी जस की तस है आवश्यकता है कि महिलाएं इस दिशा में फलदायी कदम उठाएं। अपने अधिकार क्षेत्र को मजबूती से समाज के सामने रखें। महिला ही पोषक द्वारा संचित प्रखर प्रतिभा को समर्पित करती है, तो क्या धन या भौतिक वस्तुएँ इससे ज्यादा महत्वपूर्ण है। प्रतिभा या कौशल से धन कमाया जा सकता है। इसलिए वैवाहिक जीवन में सुमंगलता लाने वाली यह प्रथा क्यों अभिभावकों पर बोझ बने, पराए धन के इसी ब्याज (दहेज) के फेर में आज कितने माता पिता जन्म से पूर्व ही कन्यावध कर देते हैं या उत्कृष्ट प्रतिभा को चारदीवारी की चौखट ही नहीं लांघने देते, उसकी प्रतिभा के सृजन की उपेक्षा करते हैं। क्या महिला कुछ नहीं कर सकती अपने माता-पिता के लिए, अपने स्वाभिमान के लिए क्या हमें गंवारपन का दामन धारण करना चाहिए या बदलाव लाना चाहिए।


समाज में व्याप्त बोझिल प्रवृत्ति की इन प्रथाओं को शिक्षित व सुसंस्कृत पीढ़ी द्वारा उखाड़ फेंक देनी चाहिए यही तो समय की मांग है। आज महिला शिक्षा को लेकर जो रूढ़िवादी धारणा व्याप्त है वो अशिक्षित परिदृश्य में ज्यादा दृष्टिपात हो रही है। 

शिक्षा 'संस्कार, समझदार और 'चेतना' का चरम बिंदु है जो किसी भी परिस्थिति को अनुकूल बनाने का आधार है अतः आवश्यक है कि समाज की दशा व दिशा की आधार 'महिला' का शिक्षित होना ही समाज की समाजिक व आर्थिक उन्नति है।

 “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ”


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