कविता: अमृता अमर जय घौष | जय खीचड़


☑️ मरुधरा महा रण घोष, आत्म, न्रप अणी मँझ।
मरुधर नगरी में प्रजा के आत्मबल और राजा के सैन्यबल के मध्य अद्वितीय युद्ध हुआ ।

☑️ किरणाळा आत्म तापे, आत्म थाट जंभ सँझ॥
 युद्ध में आत्म समूह को श्री जांभोजी का अदृश्य सहयोग था जिससे युद्ध भूमि में आत्म समुह सुर्य कि किरणों के समान प्रखर हो खड़े थे।
अमृता अमर जय घौष | जय खीचड़



☑️ धरणी धूजै अंबर गुंजै, करद करि पुलियाह।
एक ओर जहां प्रकृति की वेदना देह में समाए पेड़ों से लिपटे प्रजा हैं वहीं दूसरी ओर प्रकृति पर प्रहार को आतुर शस्त्र सज राजा का सैन्यबल ऐसी विभत्स वैला में धरती धैर्य खो धरधरा उठी, अंबर से अस्वीकार्य ध्वनि गूँजित हुई।


☑️ बिरछां पहलाँ देह झङे, केसर कीच अथाह॥
वृक्षों से पहले कट-कट गिरते देह के टुकड़े और उनसे बहते रक्त के प्रवाह से धरा तर-ब-तर हुई ।

☑️ केसर कीच अथाह, बिरछां हित तन सोँपिया।
आत्म समूह ने वृक्षों को बचाने अपना तन सौंप दिया, कटे तन के रक्त प्रवाह से मरुधरा तर-ब-तर हुई । 

☑️ विष्णोई जन समुदाय, प्रेम डांडो रोपिया॥
 विष्णु के उपासक विष्णोइयोँ ने आत्माहुति दे इस जग में प्रकृति व मानव सहचर्य के प्रेम का संचार किया ।

  ☑️ कह जय कवि-राय, देह तज रुंखा तणो।
 कवि जय कहते हैं अदृश्य शक्ति उपासकोँ ने वृक्षों के हित देह दे दी।
☑️ अमृता अमर जय घौष, जुगां जुग जस घणो॥ 
 जय घोष (सिर सांटे रूंख रहे, तो भी सस्तो जाण) कर वृक्ष से लिपटी शक्ति-स्वरूपा अमृता का उद्यघोष अमर हो गया जिसका यश जु-गोँ जु-ग तक रहेगा व समूची मानव जाति को प्रेम
संदेश देता रहेगा ।




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