आइए जाने युगपुरुष चौधरी मनीराम गोदारा के बारे में

 आइए जाने युगपुरुष चौधरी मनीराम गोदारा के बारे में 

आइए जाने युगपुरुष चौधरी मनीराम गोदारा के बारे में


चौधरी मनीराम गोदारा पूर्व गृहमंत्री, हरियाणा का जन्म नवम्बर 1923 में गांव बडोपल वर्तमान जिला फतेहाबाद में हुआ था। इनके पिता का नाम चौधरी रामजस गोदारा तथा दादा का नाम चौधरी उदाराम गोदारा था । मनीराम गोदारा के पूर्वज राजस्थान के बीकानेर जिले की लूणकरणसर तहसील के गांव उदाणा से हरियाणा आकर बसे थे। इनका ननिहाल हनुमानगढ़ जिले के निकटवर्ती ग्राम संगरिया में था। इनके नाना का नाम चौधरी रामरी धारणिया था ।



चौधरी मनीराम गोदारा : शिक्षा


चौधरी मनीराम गोदारा की प्रारम्भिक शिक्षा डी.बी. प्राइमरी स्कूल बडोपल, में प्राप्त की। मिडिल तक की पढ़ाई जाट एंगलो वैदिक मिडल स्कूल (वर्तमान ग्रामोत्थान विदयापीठ) संगरिया से प्राप्त करने के पश्चात हिसार के , पी.एन.हाई स्कूल (वर्तमान हरजीराम हाई स्कूल) से 1942 में मैट्रिक पास की। कॉलेज की पढ़ाई के लिए डी.ए.वी. कॉलेज लाहौर में दाखिला लिया। लाहौर में जिला हिसार से पढने वाले आप पहले बिश्नोई थे आपने शिमला से बीए पास किया और वर्ष 1949 में सहायक अधीक्षक जेल चयनित हुए। अगले ही वर्ष पाकिस्तान से तनातनी के माहौल में राज्य सरकार ने सिविल डिफैन्स का महकमा चालू किया जिसमें चौधरी मनीराम गोदार को इंस्पेक्टर नियुक्त किया परन्तु राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते इसी वर्ष जुलाई में पद से त्याग पत्र दे दिया।


चौधरी मनीराम गोदारा : राजनैतिक जीवन


 पंजाब विधान सभा के लिए पहली बार आम चुनाव वर्ष 1952 में हुए। बिना किसी राजनैतिक बेग्राउंड व तजुर्बे के चौ. मनीराम गोदारा ने फतेहाबाद डबल मेम्बर हल्का से कांग्रेस टिकट के लिये आवेदन पत्र दिया।  उस वक्त कांग्रेस पार्लियामेंट्री बोर्ड की एक उप कमेटी टिकट पर अंतिम निर्णय लेती थी जिसमें 3 सदस्य पंडित जवाहरलाल नेहरू, मौलाना आजाद व बापू पुरुषोत्तमदास टंडन थे। नेहरू जी ने कहा यह कैंडिडेट शिक्षित तो होने के साथ-साथ युवा है इसे टिकट देने से निश्चित ही कांग्रेस को फायदा होगा। टिकट के लिए संघर्षरत मनीराम गोदारा युवा व शिक्षित होने का फायदा मिला और उन्हें कांग्रेस से टिकट मिल गई। परन्तु निर्वाचन अधिकारी ने उनका नामांकन पत्र इस आधार पर नामंजूर कर दिया कि वह लाभ के पद का सेवारत है जबकि वो सहायक अधीक्षक जेल का उम्मीदवार थे। इस निर्णय के विरुद्ध मनीराम गोदारा चुनाव आयोग में याचिका दायर की जो चुनाव आयोग ने स्वीकार कर ली और फैसला उनके पक्ष में आया। वर्ष 1956 में हुए उपचुनाव में भारी मतों से विजय होकर मनीराम गोदारा विधानसभा सदस्य चुने गए। संभवत इन्हें दूसरे बिश्नोई विधायक होने का गौरव प्राप्त है। 

 मार्च 1971 में हुए लोकसभा के चुनाव में चौधरी मनीराम गोदारा सम्पूर्ण हरियाणा की जनरल सीटों में सबसे ज्यादा मत प्राप्तकर सांसद चुने गए। इन्हें बिश्नोई समाज के प्रथम लोकसभा सदस्य (सांसद) होने का गौरव प्राप्त है।

वर्ष 1980 में हुए लोकसभा चुनाव हार गए। फिर दिसम्बर 1983 में हल्का फतेहाबाद से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर तथा 1991 में हरियाणा विकास पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा लेकिन इस बार भी इन्हें हार का सामना करना पड़ा।

वर्ष 1996 में हुए विधानसभा चुनावों में चौधरी मनीराम गोदारा ने हरियाणा विकास पार्टी के उम्मीदवार के तौर चुनाव लड़ा जिसमें जनार्दन ने उनके पक्ष में भारी मतदान कर उन्हें विधानसभा पहुंचाया। और वो हरियाणा के गृहमंत्री बने। 

यह कहना गलत नहीं होगा कि चौधरी मनीराम बिश्नोई ने हरियाणा की राजनीति में अपने बलबुते पर स्थान बनाया। कहते हैं चौधरी देवीलाल के भीमकाय शरीर व उनकी कार्यशैली से उस समय के नेता भयभीत रहते थे। श्री गोदारा के कांग्रेस में सम्मिलित होने से कांग्रेसी नेता निर्भयता आई। चौधरी भजनलाल बिश्नोई को प्रथम बार विधायक की टिकट चौधरी मनीराम गोदारा ने ही दिलवाई थी।

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चौधरी मनीराम गोदारा रसुख परिवार से ताल्लुक रखते थे। रूपयों पैसों की उनके कोई कमी नहीं थी। राजनीति में आने के बाद उन्होंने सामाजिक दायित्व निभाते हुए गांव-गांव स्कूल खुलवाये। लोगों में शिक्षा के प्रति जागरूकता पैदा करने व पढ़ें लिखे युवाओं को रोजगार दिलवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। शिक्षा के साथ-साथ श्री गोदारा का समाज सेवा, धर्म प्रचार-प्रसार, विभिन्न बिश्नोई संगठनों, मेलों, मंदिरों में उल्लेखनीय योगदान रहा है। 

शिक्षा के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय कार्यों के कारण फतेहाबाद (भोडिया खेड़ा) के महिला महाविद्यालय का नाम चौधरी मनीराम गोदारा राजकीय कन्या महाविद्यालय किया गया।


साम्प्रदायिक दंगो के चलते लाहौर से लौटे


जब साम्प्रदायिक उपद्रवों के कारण लाहौर के सभी शिक्षण संस्थान अनिश्चित काल के लिये बन्द कर दिये गए तो चौधरी मनीराम गोदारा लाहौर से अपने गांव बडोपल आ गये। उस वक्त लाहौर के निकटवर्ती गांव राजगढ के मुसलमानों ने निकट लगते कृष्णनगर और सन्त नगर को खत्म करने की योजना बनाई। जिसकी सूचना मिलने पर चौधरी मनीराम गोदारा के साथियों ने उन्हें तार भेजकर लाहौर बुलाया। सूचना पाकर वो लाहौर पहुंच गये। मुसलमानों द्वारा हमला करने से पहले ही श्री गोदारा ने अपने साथियों के साथ मिलकर उन्हें राजगढ में हमेशा के लिये शांत कर दिया। उसके बाद वो अपने गांव बडोपल लौट आए।

जब वो बडोपल में थे तब हिसार जिले में भी हिन्दु-मुसलमान साम्प्रदायिक फसाद शुरू हो गए। लालवास व उसके आस-पास के तमाम गांव (केवल गांव रत्ताखेडा को छोड़कर) मुसलमानों बाहुल्य वाले थे। अतः लालवास और रत्ताखेडा के बिश्नोई-जन व अन्य हिन्दू-सिख वहां से पलायन कर अपने रिश्तेदारों के पास हिन्दू-सिख बाहुल्य क्षेत्र में रहने लगे।

  इन साम्प्रदायिक तनाव से चौधरी मनीराम गोदारा का परिवार भी अछूता नहीं रहा। उनके दादा ससुर आदि बडोपल आ गये। उनके दादा-ससुर चौधरी बीरबल जी ढूकिया के पास लाइसेंसधारी बन्दूक थी। परन्तु कारतूस केवल 20 ही थे। अतःचौधरी मनीराम गोदारा वह बन्दूक और लाइसेन्स लेकर हिसार अपनी साइकल पर गये ताकि वहां से कारतूस खरीद कर ला सके। साम्प्रादायिक उपद्रवों के कारण उन दिनों बसें नहीं चलती थीं। हिसार से लौटते वक्त अग्रोहा गांव में उन्होंने देखा कि सड़क के उत्तरी भाग के डोगर मुसलमान सड़क के दक्षिण भाग के हिन्दुओ पर हावी हो रहे हैं। चौधरी मनीराम गोदारा ने डोगर मुसलमानों से मुकाबला करना शुरू कर दिया । वह खुल्ले में थे अतःसोचा कि पास स्थित खेजड़ी वृक्ष की ओट ली जाए। वो तिरछे चलकर खेजड़ी की ओर जा रहे थे कि टोपीदार बन्दूक की गोली उनके दायें हाथ पर लगी जो हड्डी को पार करके पेट में जा लगी। उन्होंने पेट के उस हिस्सा पर दबाव देकर गोली बाहर निकाल दी। फिर एक आदमी ने उनको अपनी घोडी पर लांधडी गांव में उनके सम्बन्धी चौधरी सोहनलाल जी जोहर के पास पहुंचाया। जिन्होंने तुरन्त ही अपनी कार पर उन्हें हिसार में डाक्टर राजेन्द्रनाथ के पास उपचार हेतु पहुंचाया और इलाज़ करवाया।


चौधरी मनीराम गोदारा की गुरू जम्भेश्वर भगवान और बिश्नोई धर्म में पूरी आस्था थी। श्री मुक्ति धाम मन्दिर पर फाल्गुन मेला के आवसर पर वर्ष 1950 से जाना शुरू किया था और कई मेलों पर गये थे। पहले बाजार पुराने निज मन्दिर के सामने से लगना शुरू होता था। उस वक्त मेलों के अवसर पर कुछ लोग गुण्डागर्दी करते थे। वर्ष 1955 में वहां हुए अधिवेशन के समय असामाजिक तत्वों की पीटाई की गई। जिससे पश्चात मेलों में अनुशासन स्थापित हो पाया। 


 वर्ष 1954 में मुकाम की प्राचीन पंचायत व उसके पंचों में आपसी फुट पड़ने पर चौधरी मनीराम गोदारा के प्रयासों से मेला, समाधि-मंदिर व संगठन महासभा के अधीन करवाए गए। जिसके लिए मुकाम में आठवां अधिवेशन आयोजित किया गया जिसमें स्वागत समिति के अध्यक्ष गोदारा थे।

चौधरी मनीराम गोदारा ने हिसार में आयोजित हुए महासभा के 7वें अधिवेशन में भी भाग लिया।

 

सरल व सहज व्यक्तित्व के धनी चौधरी मनीराम गोदारा बात के पक्के व संजीदा व्यक्ति थे। उनके संदर्भ में कहा जाता है कि गोदारा साहब ने जिस कार्य के लिए हां कह दी समझो वह कार्य हो गया। उन्होंने हमेशा निम्न वर्ग के लोगों के अधिकारों की पैरवी की। वर्ष 1951 से क्षेत्र के मजदूर वर्ग के अधिकारों के लिए संघर्ष किया, दर्जनों गांवो के मजदूर वर्ग को हक-हुक़ूक़ मलकियत दिलवाई। 

 

जीवन के अंतिम पड़ाव को चौधरी मनीराम गोदारा ने अपने गांव नीमड़ी में रहकर गुजारा। दिनांक 15 जून, 2009 को हृदयाघात होने से उनका स्वर्गवास हो गया। 

आज वो भले ही देहिक रूप में हम सब के मध्य नहीं है लेकिन अपने शिक्षा, समाज व देश के उत्थान के महत्वपूर्ण कार्यों को अंजाम देकर हम सबके दिलों में जिंदा है।


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